डॉ. अंजली दीवान, ग्रह विज्ञान विभाग, सेंट बीडज कालेज, शिमला

बर्फ की मैं हूँ दीवानी
जब यह आती है तब मैं करती हूँ स्वागत ।
हाथों में ले भीग-भीग जाती हूँ
ठंड होते हुए भी नहीं होता
उसका एहसास ।

निकल पड़ती हूँ सड़क पर
बिना छाते के
उसके फाहों का नहीं कोई भार
बस छू कर निकल जाते हैं ।

उनको आसमां ने भेजा
वो नीचे आये पानी बनकर
समां गए धरती में ।
कोई शिकवा नहीं, गिला नहीं,
कोई अस्तित्व भी नहीं
न कोई अपेक्षाएं, न कोई महत्वकांक्षाएं ।

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